बुधिया सिंह याद है ? वही जो 7 घंटे में 65 KM दौड़ गया था, जानिए अब कहां है

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समय कब बदल जाये कहा नहीं जा सकता। आज से करीब 12 साल पहले मिडिया अखबारो मे एक नाम छाया हुआ था बुधिया सिंह। बुधिया का नाम जेहन में आते ही एक छोटा सा बच्चा जो असाधारण प्रतिभा का धनी था जिसने मात्र साढे चार साल की उम्र में ही 65 किलोमीटर की दौड बिना रूके 7 घंटे में पूरी की थी। 65 किलोमीटर दौडना अच्छे से अच्छे एथलीटों के लिये भी मुश्किल काम है लेकिन बुधिया ने साढे चार साल की उम्र में यह दौड पूरी करके देश को ओलपिंक का सपना दिखाया था। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजुर था। सरकार की अनदेखी के चलते भारत की यह विलक्षण प्रतिभा आज गुमनाम हो गयी है।

बिंरचीदास ने देखी थी प्रतिभा

बुधिया के जीवन की कहानी भी किसी फिल्म की कहानी की तरह है। बेहद ही गरीबी से निकलने वाले इस बच्चे ने जब भूवनेश्वर से पूरी के बीच की 65 कीमी की दूरी 7 घंटे में पूरी की थी तब देशवासियों ने उन्हें सर आंखो पर बिठा लिया था। चारों तरफ एक ही नाम था और वो था बुधिया सिंह। लेकिन बुधिया की सफलता के पीछे जिस व्यक्ति की सबसे बडी मेहनत थी वो थे उनके कोच बिरंची दास। जब तक बिरंची दास का साथ बुधिया को मिला वो सफलता की उॅचाईयां छू रहे थे लेकिन जब उनका साथ छुटा इस प्रतिभा की चमक भी किन्हीं अंधेरो में खो गयी।

मां ने बेच दिया था 800 रूपये में

बुधिया का बचपन बेहद ही गरीबी में बिता। उनका जन्म उडीसा के एक छोटे से गांव में वर्ष 2002 में हुआ। उनका जन्म जिस परिवार में हुआ वो गरीबी में दाने दाने को मोहताज था। माता पिता के अलावा बुधिया के परिवार में दो और भाई बहन थे। जब वह 2 वर्ष का हुआ तब उसके पिता का साया भी उस पर से उठ गया। अब 3 बच्चों के परिवार की सारी जिम्मेदारी बुधिया की मां पर आ गयी। लेकिन इसे बदनसीबी ही कहेंगे की गरिबी के चलते केवल 800 रूपये के लिये बुधिया की मां ने उसे एक फेरी वाले को बेच दिया। बुधिया की मां को पता नहीं था जिस बच्चे को बेच रही है वो असाधारण प्रतिभा का धनी है।

बिरंची दास ने उठायी थी जिम्मेदारी

बुधिया से फेरी वाला छोटी सी उम्र में भी बहुत काम कराता था। लेकिन शायद ये ही वजह रही कि वह कम उम्र में ही मजबुत होता जा रहा था। उसके इन दूखदायी दिनों का तब अंत हुआ जब एक दिन बिरंचीदास ने उस फेरीवाले को पैसे देकर उससे मुक्त करवा दिया। लेकिन जब उन्हें पता चला कि बुधिया के घर की स्थिती ठिक नहीं है तब उसे उन्होनें खुद उसके पालन पोषण का जिम्मा लिया। बिरंची दास ने उससे पहले भी 22 अनाथ बच्चों को पनाह दी हुयी थी। बुधिया की स्थिती ठिक थी लेकिन एक दिन ऐसी घटना घटी जिससे उसकी प्रतिभा निखर कर बिरंची दास के सामने आ गयी।

लिम्का बुक रिकार्ड में दर्ज हुआ नाम

एक दिन किसी बात पर बुधिया ने एक बच्चे को चिढा दिया। इस पर बिरंचीदास ने उसे मैदान में तब तक दौडते रहने के लिये कहा जब तक वे खुद उसे मना न कर दें। बिरंचीदास किसी काम में लग गये और बुधिया की सजा के बारे में भूल गये। जब उन्होनें पॉच घंटे बाद देखा कि बुधिया तब भी दौड रहा था। उस दिन बिरंचीदास को उसकी प्रतिभा के बारे में पता लगा। उन्होनें फिर बुधिया को दौडने के लिये प्रशिक्षित किया। वो चाहते थे कि बुधिया देश के लिये ओलंपिक मेडल लाये। बिरंचीदास की मेहनत और बुधिया की प्रतिभा के मेल से बुधिया ने कई मेराथन में भाग लिया और सभी का ध्यान खींचा।भूवनेश्वर से पूरी के बीच की 65 किमी की उसकी दौड में उसका साथ सीआरपीएफ के 200 जवानों ने भी दिया जो कि उसके साथ दौड रहे थे। इतनी कम उम्र में वह इतनी लम्बी दूरी दौडने वाला वह दुनिया का पहला धावक बन गया। उसके नाम यह रिकार्ड लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हो गया। इसके बाद उसने कई मेराथन में हिस्सा लिया।

बुधिया का भेजा सरकारी स्पोर्ट्स हॉस्टल

बुधिया का पुरी दुनिया में नाम हो रहा था विज्ञापनों में उसे जगह मिली। बिरंचीदास को भी लोगों का सहयोग मिला जिससे अपने अनाथ आश्रम चलाने में मदद मिली। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजुर था। बिरंची दास पर कुछ संस्थाओ और बुधिया की मां ने बाल शोषण के आरोप लगाये। ये कहा गया कि इतनी छोटी सी उम्र में उससे क्षमता से अधिक मेहनत करायी जा रही है। साल 2007 में बिरंचीदास को जेल हुयी और बुधिया का संरक्षण सरकार ने अपने हाथ में लेकर उसे सरकारी स्पोर्ट्स हॉस्टल में भेज दिया। बिरंचीदास को जेल से तो रिहाई मिली लेकिन सन 2008 में उनकी हत्या हो गयी। बिरंचीदास के मरते ही बुधिया इस दुनिया की भीड में कहीं खो गया।

नहीं मिल पाया उचित प्रशिक्षण

आज बुधिया 16 साल का हो गया है लेकिन उसकी सफलता को निखारने वाला बिरंचीदास अब उसके साथ नहीं है। शायद ये ही वजह है कि आज बुधिया खुद को कहीं कमजोर पाता है। वह कहता है कि मैं एक या दो किमी की दौड में तो किसी से भी हार सकता हूॅ लेकिन अगर लंबी दूरी की मेराथन हो तो मै आज भी सबको पीछे छोड सकता हॅु। उसको अपने गुरू बिरंचीदास के अंतिम दर्शन नहीं कर पाने का भी दुख है। वो कहता है कि मुझे वो प्रशिक्षण नहीं मिल पाया जिसके दम पर मैं देश का नाम रोशन कर सकता। बुधिया के जीवन पर बुधिया सिंह बार्न टू रन फिल्म भी बन चुकी है जिसमें मनोज वाजपेयी ने बिरंचीदास का और मयुर पटोले ने बुधिया सिंह का किरदार निभाया है।

फिल्म का है इंतजार:

बुधिया ने बताया कि उसे अपने ऊपर बन रही फिल्म के रिलीज होने का इंतजार है। बुधिया को लगता है कि अगस्त में रिलीज हो रही फिल्म को देखकर लोगों का ध्यान उसकी तरफ जरूर जाएगा। बुधिया ने कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि लोग मेरी फिल्म देखेंगे और फिर से रफ्तार पकड़ने में मेरी मदद करेंगे।’

प्रोड्यूसर ने दिए हैं पैसे:

बुधिया की मां ने बताया कि फिल्म के प्रोड्यूसर ने उन्हें 2.7 लाख रुपए दिए हैं। इसे वह अपने बेटे के करियर में लगाना चाहती हैं। हालांकि, उनकी बहन की इस साल शादी होनी है। इसलिए मिले पैसों में से कुछ उसमें लगेंगे और बाकी को बुधिया के लिए रख दिया जाएगा।

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