जानिए भगवान जगन्नाथ और मंदिर के चमत्कार और रहस्य

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हेल्लो दोस्तों आज धर्म संस्करण के अंतर्गत हम आपको पुरी के बारे में बता रहे हैं ओडिशा प्रान्त के पुरी जिले में भगवान ‘जगन्नाथ जी’ की रथयात्रा हर वर्ष निकाली जाती है। ये परंपरा पिछले लगभग 500 सालों से चली आ रही है। इस रथ यात्रा से कई तरह की मान्यताएं जुड़ी हैं। ये यात्रा विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस उत्सव को आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। Facts and Secret Of Jagannath Temple

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का महोत्सव 10 दिन का होता है, जो शुक्ल पक्ष के ग्यारहवे दिन खत्म होता है। इस दौरान जगन्नाथ पुरी उड़ीसा में लाखों की संख्या में लोग पहुंचकर इस महाआयोजन का हिस्सा बनते हैं।

इस दिन भगवान कृष्ण, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को रथों में बैठाकर गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता है। तीनों रथों को भव्य रूप से सजाया जाता है। जिसकी तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है।

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भगवान जगन्नाथ विष्णु के 10वें अवतार :

भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी चमत्कारी बातों की बात करने से पहले हम बता रहे हैं भगवान जगन्नाथ किसका अवतार हैं। भगवान जगन्नाथ विष्णु भगवान के 10वें अवतार का रूप माने जाते हैं। जो 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं।

भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी चमत्कारी बातों की बात करने से पहले हम बता रहे हैं भगवान जगन्नाथ किसका अवतार हैं। भगवान जगन्नाथ विष्णु भगवान के 10वें अवतार का रूप माने जाते हैं। जो 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं। पुराणों में जगन्नाथ पुरी धाम को धरती का बैकुंठ कहा गया है।

Facts and Secret Of Jagannath Temple
Facts and Secret Of Jagannath Temple

यह हिन्दू धर्म के चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी में से एक है। कहा जाता है तीन बद्रीनाथ, द्वारिका और रामेश्वरम की यात्रा करनी चाहिए उसके बाद ही जगन्नाथ पुरी आना चाहिए।

स्कंद पुराण के अनुसार, पुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। वह यहां सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए। सबर जनजाति के देवता होने की वजह से यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। जगन्नाथ मंदिर की महिमा देश में ही नहीं विश्व में भी प्रसिद्ध हैं।

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आखिर क्यों समुद्र बार बार मंदिर तोड़ने की करता है कोशिश :

पुरी के समुद्र की विशाल लहरें इतनी तेज होती हैं जैसे ये पूरे मंदिर को तोड़ ही देंगी इसी संबंध में पुराणों में एक कथा भी प्रचलित की एक बार राजा इंद्रदमन जगन्नाथ मंदिर निर्माण के लिए अथक प्रयास कर चुका था लेकिन जगन्नाथ मंदिर नहीं बन पा रहा था। कुछ दिन पहले ही राजा इन्द्रदमन के स्वप्न में श्री कृष्ण जी आये थे और कहा था कि राजन आप समुद्र किनारे एक मंदिर बनवाओ जिसमें मूर्ति पूजा नहीं होनी चाहिये

आप मंदिर में सिर्फ एक संत नियुक्त करें, जो कि दर्शकों को गीता जी का पाठ सुनाया करेगा। श्री कृष्ण जी की आज्ञा पालन हेतु राजा इन्द्रदमन ने पांच बार मन्दिर बनवाया लेकिन हर बार समुद्र तीव्र वेग से उफ़न कर आता और अपने प्रतिशोध में जगन्नाथ मन्दिर को बहा ले जाता।

त्रेतायुग में जब विष्णु जी श्री राम रूप में अवतरित थे तब श्री राम की पत्नी सीता को रावण ने चुरा लिया था और लंका तक पहुंचने के लिए श्री राम को समुद्र ने रास्ता नहीं दिया तो श्री राम ने समुद्र को धमकाया था उसी का प्रतिशोध लेने के लिए समुद्र राजा इन्द्रदमन द्वारा बनाये गए जगन्नाथ मंदिर को नहीं बनने दे रहा था। इसलिए आज भी पुरी में मंदिर के बाहर समुद्र जोर जोर से आवाज करता है

Facts and Secret Of Jagannath Temple
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मंदिर में मूर्तियों के हाथ-पांव की उंगलियां अधूरी क्यो रह गई :

उधर कुछ दिन बाद वह नाथ जी फिर आए और उनके पूछने पर राजा ने पूरा वृतांत बताया तो नाथ जी ने कहा कि पिछले 10-12 दिन से वह कारीगर मूर्ति बना रहा है, कहीं गलत मूर्तियां ना बना दे। हमें मूर्तियों को देखना चाहिये, यह सोचकर कमरे में दाखिल हुए तो कबीर परमात्मा गायब हो गये। तीनों मूर्तियां बन चुकी थी लेकिन बीच में ही व्यवधान उत्पन्न होने से तीनों मूर्तियों के हाथ और पांव की ऊँगलियां अधूरी रह गई। इस कारण मंदिर में बगैर ऊँगलियों वाली मूर्तियां ही रखी गईं।

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क्या है रथ यात्रा :

जगन्नाथ रथ यात्रा, यानि की भगवान जगन्नाथ को रथ पर बिठाकर पूरे नगर की यात्रा करवाई जाती है। इस शहर का नाम जगन्नाथ पुरी से निकल कर पुरी बना है। सबसे पहले भगवान जगन्नाथ जी के रथ के सामने सोने के हत्थे में लगी झाड़ू से सफाई की जाती है।

सफाई के बाद मंत्रोच्चार और जयघोष होता है। इसी के साथ शुरू होती है ये मशहूर रथयात्रा। इस यात्रा में विशाल रथ होते हैं जिनपर भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं।

पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज के बीच इन रथों को कई हजार लोग मोटे-मोटे रस्सों की मदद से खींचते हैं। सबसे आगे होता है बलभद्र जी का रथ जो सबसे पहले तालध्वज में प्रस्थान करता है। इसके ठीक पीछे खींचा जाता है बहन सुभद्रा जी का रथ। इन दोनों रथों के पीछे होता है जगन्नाथ जी का रथ। तीनों रथों को श्रद्धालु रस्से पकड़ कर खींचते हैं और पूरे नगर में घुमाते हैं।

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मान्यता :

रथ खींचने के लिए पुरी में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होती है। इतनी तादाद में लोग इसलिए जमा होते हैं क्योंकि लोगों का मानना है जो लोग रथ खींचने में सहयोग करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस यात्रा का अंतिम स्थान होता है गुंदेचा मंदिर। यहां पहुंचकर ये यात्रा संपन्न हो जाती है। इस मंदिर को ‘गुंदेचा बाड़ी’ भी कहते हैं।

भगवान की मौसी का घर :

कहा जाता है कि इस मंदिर में विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। साथ ही इस जगह को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। यदि सूर्यास्त तक रथ गुंदेचा मंदिर नहीं पहुंच पाता तो अगले दिन ये यात्रा पूरी की जाती है।

गुंदेचा मंदिर में भगवान एक हफ्ते तक रहते हैं। यहां हर रोज उनकी पूजा अर्चना होती है। उनकी मौसी का घर बताए जाने वाले इस मंदिर में भगवान को कई तरह के स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाते हैं।

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भगवान जगन्नाथ की मुख्य विशेषताएं :

  • भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर जो झंडा है वो हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है।
  • भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है।
  • भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देगी।
  • आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उठते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। इतना ही नहीं हवाई जहाज भी भगवान जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से नहीं निकलता।
  • भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।
  • बारिश होने के छह-सात दिन पहले मंदिर की छत से पानी की बूंदे टपकने लगती हैं। इतना ही नहीं जिस आकार की बूंदे टपकती हैं, उसी आधार पर बारिश होती है। छत टपकने के रहस्य के बारे में, मंदिर के पुजारी बताते हैं कि पुरातत्व विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक कई दफा आए, लेकिन इसके रहस्य को नहीं जान पाए हैं। अभी तक बस इतना पता चल पाया है कि मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य 11वीं सदी में किया गया।
Facts and Secret Of Jagannath Temple
  • दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।
  • भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा।
  • आमतौर पर दिन में चलने वाली हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती और शाम को धरती से समुद्र की तरफ, लेकिन भगवान जगन्नाथ मंदिर धाम में यह प्रक्रिया उल्टी है।
  • इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह की तरफ दिखाई देता है।
  • अंतिम और सबसे खास रहस्य तो ये है कि हर 12 साल में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को बदला जाता है, उस दौरान पूरे शहर में बिजली काट दी जाती है और एक पंडित पुरानी मूर्ति में से एक अमृत रूपी चीज को निकालकर नई वाली मूर्ति में स्थापित किया जाता है और इस दौरान पंडित की ऑंखें बंद रखी जाती है, वह क्या है आज तक किसी को नहीं पता।

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जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद :

आनंदा बाज़ार में मंदिर की रसोई में भगवान के महाभोग के लिए महाप्रसाद को लकड़ी के चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन में 40 से 50 क्विंटल चावल और 20 क्विंटल दाल व सब्जियों समेत तैयार किया जाता है। इस महाप्रसाद को करीब 500 रसोइए 300 सहयोगियों के द्वारा बनाते है। जिसे रोज करीब 20 हज़ार लोगों को और त्योहारों के समय में करीब 50 हज़ार भक्तो को भोजन कराया है।

महाप्रसाद में चावल, घी चावल, मिक्स चावल, जीरा, हींग, अदरक मिक्स चावल और नमक के साथ मीठी दाल, प्लेन मिक्स दाल, सब्जी, तरह-तरह की करी, सागा भाज़ा (पालक फ्राई) और दलिया होता है। नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद यहां विशेष रूप से मिलता है। महाप्रसाद दो तरह का होता हैं। सूखा और गीला। ।

इस खाना को सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के सामने पेश किया जाता है। इसके बाद देवी बिमला को अर्पण किया जाता है, महाभोग के बाद यह महाप्रसाद आनंद बाजार में बेहद कम दाम में बिक्री के लिए उपलब्ध होता है।

सभी श्रद्धालु, आनंद बाज़ार के इस महाप्रसाद का स्वाद लेना पसंद करते हैं। विशेष बात यह भी है कि हमने कच्ची हरी मिर्च, पीली मिर्च, लाल मिर्च तो देखी थी लेकिन पुरी में भोजन के साथ हर बार सलाद में लगभग काले रंग की मिर्च अवश्य मिलती है।

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पुरी के जगन्नाथमंदिर का विशाल रसोईघर विश्व का सबसे बड़ा रसोईघर है। जहाँ लगभग 700 से 800 रसोइये काम करते है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ को भोग का प्रसाद इसी रसोई में बनता है। मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 से ज्यादा भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। रोजाना पकाए जाने वाले भोजन का भगवान को भोग लगाया जाता है।

कैसे पहुंचें जगन्नाथ पुरी, ओडिशा

ओडिशा, हवाई, रेल और सड़क, तीनों मार्ग से जुड़ा है। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से जगन्नाथपुरी 60 कि.मी. दूर है।

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हवाई मार्ग :

भुवनेश्वर, निकटतम हवाई अड्डा है यह भारत के सभी राज्यों से जुड़ा हुआ है। सरकारी और निजी एयरलाइंस की कई फ्लाइट्स हैं जो भुवनेश्वर को कोलकाता, दिल्ली, रायपुर, हैदराबाद, नागपुर,वाराणसी, मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों से जोड़ती हैं।

रेल मार्ग से:

भुवनेश्वर, नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। रेल से ओडिशा की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठाया जा सकता है। यात्रा सुविधाजनक भी है और आरामदेह भी।कई ट्रेनें भारत के अन्य कोनों को ओडिशा से जोड़ती हैं। कई महत्वपूर्ण ट्रेनों की सेवाएं ,राजधानी, कोणार्क एक्सप्रेस, कोरोमोंडल एक्सप्रेस आदि ओडिशा के अन्य जिलों गंजम, खुर्दा, कोरापुट, रायगढ़, नौपाड़ा-गुनुपुर में भी रेलवे स्टेशन हैं।

सड़क मार्ग से:

भुवनेश्वर, राष्ट्रीय राजमार्ग पर आता है, जो चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों को जोड़ता है। इस वजह से जिन्हें सड़क पर लंबी यात्राएं करने का शौक है, उनके लिए ओडिशा पहुंचना ज्यादा आरामदेह और आसान है। ओडिशा में सड़कों का व्यापक नेटवर्क है। इससे ओडिशा के कोने-कोने तक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 5, 6, 23, 42 और 43 राज्य से होकर गुजरते हैं। इससे सड़क से यात्रा आसान हो जाती है। इन मार्गों पर नियमित बस सेवा चलती है।

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