हिंगलाज माता को समान रूप से पूजते हैं हिन्दू और मुसलमान

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दोस्तों ! रहस्यों से भरी इस दुनिया में अनेकों रहस्य ऐसे हैं जिनके बारे में जानकर हमें आश्चर्य होता है| क्या आपको मालूम है कि देवी माँ का एक ऐसा मंदिर भी है जहाँ मुसलमान भी श्रद्धा से शीश झुकाते है और देवी माँ के दर्शन को पावन हज यात्रा के समान मानते हुए इसे ‘नानी का हज’ कहते हैं| क्या आप जानना नहीं चाहेंगे उस माता के स्थान के बारे में ? देवी माँ कौन हैं ? इनका प्रमुख स्थान कहाँ पर है? हिन्दुओं से साथ मुसलमान भी क्यों जाते हैं माता के दर्शन को ?

आइये दोस्तों ! हम आपको बताते हैं इस रहस्य के बारे में, तो क्या आप तैयार हैं ?

उस परम तेजस्वी देवी का नाम है ‘हिंगलाज माता’| माता का प्रमुख मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में और कराची से लगभग 120 किमी. दूर हिंगोल नदी के तट पर हिंगलाज में स्थित है और यह एक विश्व प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है|

पौराणिक मान्यता के अनुसार

ऐसा माना जाता है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव उनका मृत शरीर हाथों में लेकर तांडव करने लगे | जिसके कारण सम्पूर्ण लोकों में त्राहि त्राहि मच गई | तब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र से माता सती की देह के 51 टुकड़े कर दिए और भारत वर्ष में जहाँ जहाँ भी उनकी देह के टुकड़े गिरे वे स्थान माता के शक्ति पीठों के रूप में जाने जाते हैं | उस समय माता का सर कट कर हिंगलाज में गिरा था और इसी कारण यहाँ भी माता का स्थान शक्ति पीठ के रूप में जाना जाता है |

लोक गाथाओं के अनुसार हिंगलाज माता को चारणों की प्रथम कुलदेवी कहा जाता है और इसका पावन स्थान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में हिंगलाज में है | यह भी माना जाता है के सातों द्वीपों के समस्त देवियाँ रात में रास रचाकर प्रात:काल सभी हिंगलाज माता के गिर में वापस आ जाती हैं | दुर्गम पहाड़ियों के मध्य बसा है माता हिंगलाज का यह मंदिर | यहाँ माता सती कोटटरी के रूप में, भगवान शिव भीमलोचन भैरव के रूप में विराजमान हैं |

माता के मंदिर में गणेश जी, कालिका माता की प्रतिमाओं के अतिरिक्त ब्रह्मकुंड और तीरकुण्ड जैसे तीर्थ स्थल भी हैं | पुरातन काल से ही इस मंदिर में पूजा उपासना का बड़ा महत्व है| गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे संत भी माता के दरबार में आ चुके हैं | भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि ने यहाँ कठोर तप किया था, वह स्थान आज भी आसराम के नाम से यहाँ स्थित है |

राम और परशुराम भी आ चुके हैं माँ हिंगलाज के दरबार में :

हिंगलाज माता को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति प्रदान करने वाली देवी के रूप में माना जाता रहा है| हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार 21 बार धरा को क्षत्रिय विहीन करने के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान परशुराम ने हिंगलाज माता की आराधना की थी और रावण वध के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए श्रीराम भी हिंगलाज माता की शरण में आये थे |

हिंगलाज माता का मंदिर इतना विख्यात है कि यहाँ पूरे वर्ष भर माता के दर्शन को भक्तजनों का ताँता लगा रहता है | नवरात्रों में नौ दिन तक हिंगलाज माता के दरबार में शक्ति उपासना का विशेष आयोजन किया जाता है | सिंध और कराची से लाखों हिदू भक्त माता के दर्शन को आते हैं वहीँ मुस्लिम धर्म के लोग भी यहाँ मत्था टेकने आते है और उनका मानना है कि यहाँ पर स्थित कुओं के पानी में स्नान करने से सभी गुनाहों का खात्मा हो जाता है और वही सबाब मिलता है जो मक्का मदीना का हज कर मिलता हैं| इसी कारण मुसलमान हिंगलाज माता के दर्शनों के लिए की जाने वाली यात्रा को ‘नानी का हज’ कहते हैं |

हिंगलाज माता के अवतार:

हिंगलाज माता सूर्य से भी अधिक प्रभावशाली और स्वेच्छा से अवतार धारण करने में समर्थ हैं | आदि शक्ति हिंगलाज माता ने 8वीं सदी में सिंध प्रान्त में मामड़ (मम्मड़) के यहाँ आवड देवी के रूप में दूसरा अवतार लिया| ये आवड, गुलो, हुली, रेप्यली, आछो, चंचिक और लध्वी आदि सात बहने थी और सभी परम सुंदरियाँ थी |

सिंध का यवन बादशाह हमीर सुमरा ने इनसे विवाह का प्रस्ताव भेजा और इनके पिता के मना करने पर हमीर ने उन्हें बंदी बना लिया | उस वक़्त छह देवियाँ तो सिंध से तेमडा पर्वत पर आ गई | आवड देवी काठियावाड़ के दक्षिणी पर्वतों में अपना स्थान बनाकर रहने लगी और बाद में उन्होंने भी तेमडा पर्वत को अपना स्थान बनाया| बड़ी संख्या में चारण लोग माता के दर्शन को यहाँ आने लगे और बहुत से राजस्थान में ही बस गए |

आवड माता का स्थान जैसलमेर से 20 मील दूर एक पहाड़ी पर स्थित है| 15वीं शताब्दी में राजस्थान छोटे छोटे रजवाडो में बंटा हुआ था और एक दूसरे की रियासतों में होने वाली लूट खसोट से जनता त्राहि त्राहि कर रही थी | तब उनके कष्ट मिटने को माता हिंगलाज ने मेहाजी चारण के घर करणी माता के रूप में अवतार लिया और जन जन के कष्टों का निवारण किया |

यात्रा का मार्ग :

हिंगलाज माता के सिद्ध पीठ की यात्रा पहाड़ी और रेगिस्तानी दो मार्गो से की जाती है | यात्री जत्था कराची से लसबेल होता हुआ ल्यारी आता है | हिंगलाज माता का मार्ग अत्यंत दुर्गम और ऊबड़ खाबड़ होने के साथ दूर दूर तक आबादी विहीन है | मार्ग में अनेक बरसाती नालों के अतिरिक्त कुए के साथ शुष्क बरसाती नदी भी मिलती है, इसके आगे हिंगोल नदी आती है और फिर चद्र्कूप पर्वत, इन दोनों के मध्य 15 किमी. की दूरी है |

हिंगोल नदी पर मुंडन कराकर पूजा की जाती है और जनेऊ धारण कर पैदल यात्रा आरम्भ होती है| इसके आगे सड़क नहीं है, आगे आसपुरा में विश्राम के बाद यहाँ साफ़ कपडे पहन कर पुराने कपडे दान कर दिए जाते हैं | यहाँ से कुछ दूरी पर काली माता का 2000 वर्षो से भी पुराना मंदिर है|

यहाँ से यात्री हिंगलाज माता के पर्वत पर दर्शन को पहुँचते है जहाँ के मीठे पानी के 3 कुए हैं और ऐसा माना जाता है कि इनका पावन जल मन को पवित्र कर सभी पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है | यहीं पहाड़ की गुफा में हिंगलाज माता का मंदिर है और माता की परिक्रमा गुफा में होकर की जाती है | मंदिर से समीप ही गुरु गोरखनाथ का झरना है और ऐसी मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहाँ स्नान करने आती हैं | द्वार पर गणेश जी के दर्शन होते है और सामने माता वैष्णो देवी स्वरूपा माता हिंगलाज की मूरत विराजित है |

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