ऐसा होता है आइसोलेशन वार्ड, जहां रखा जाता है कोरोना के मरीज को

हेल्लो दोस्तों कोरोना वायरस (coronavirus) के कुल मामले अब 93,567 हो चुके हैं. इसमें लगभग 80 हजार के साथ चीन (China) में सबसे ज्यादा मामले हैं. वहीं 28 मामलों के साथ भारत 25 नंबर पर है. तेजी से फैलती इस रहस्यमयी बीमारी पर नियंत्रण के लिए सरकार कई स्तरों पर कोशिश कर रही है. How an Isolation Ward

इसी संदर्भ में आजकल बार-बार एक ही शब्द सुनाई पड़ रहा है- कोरोना आइसोलेशन वार्ड (isolation ward). जानें, क्या है आइसोलेशन और अस्पताल के दूसरे कमरों से किस तरह से अलग है.

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क्यों बढ़ा है खतरा :

कोरोना के लक्षण एकदम से सामने नहीं आते, बल्कि दिनों का वक्त लेते हैं. इसे इनक्यूबेशन पीरियड कहते हैं. यानी वो वक्त, जब किसी बीमारी के वायरस या बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश तो कर जाते हैं लेकिन उसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. वायरस के भीतर जाने से लेकर संक्रमण के लक्षणों के सामने आने के बीच लगा वक्त इनक्यूबेशन पीरियड कहलाता है.

Center for Immunization and Respiratory Diseases की डायरेक्टर डॉ नैंसी मेसोनिअर के अनुसार कोविड 19 के लिए इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिनों का होता है. वैसे चीन के वुहान में कुछ मामलों में ये वक्त 24 दिनों का भी देखा गया.

How an Isolation Ward

इस प्रक्रिया के तहत इलाज :

वायरस होने के बावजूद लक्षण सामने न आने की वजह से मामले लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे में बीमारी से निपटने के लिए कई चरण तैया किए गए हैं. संदिग्ध लगने वाले मामलों में मरीज के सैंपल लेकर जांच के लिए अलग लैब में भेजे जाते हैं. रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर मरीज को आइसोलेशन में रखा जाता है.

अस्पताल के इस कमरे में इंफेक्शन कंट्रोल के सारे प्रोटोकॉल पूरे किए जाते हैं. यहां सिर्फ कोरोना के मरीजों को रखा जा रहा है ताकि उनकी सांस, थूक या बलगम से संक्रमण न फैले.

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कोरोना के मरीज के लिए आइसोलेशन क्या है :

इन मरीजों को “Respiratory Isolation” में रखा जाता है. यानी इनके वार्ड में कोई भी बगैर N-95 रेस्पिरेटर मास्क लगाए बिना प्रवेश नहीं कर सकता. N-95 एक खास तरह का मास्क है जो हवा में पाए जाने वाले 95 प्रतिशत बैक्टीरिया और वायरस को फिल्टर कर देता है.

आइसोलेशन रूम को निगेटिव प्रेशर रूम माना जाता है, जहां मरीजों को संभालने के लिए किसी भी किस्म की अफरातफरी न हो और पर्याप्त स्टाफ हो. इस कमरे के दरवाजे हरदम बंद रहते हैं.

एकदम खास तरह के इन कमरों को इस तरह से तैयार किया जाता है कि यहां की हवा बाहर नहीं जा सकती है. यहां तक कि आसपास के कमरों या कॉरिडोर में भी इस कमरे की हवा नहीं फैल सकती है. मरीजों की देखरेख करने वाला अस्पताल स्टाफ मास्क, गाउन, और आंखों पर खास किस्म का चश्मा पहनता है ताकि संक्रमण से बचा जा सके.

How an Isolation Ward

कब रखा जाता है इस कमरे में :

रेस्पिरेटरी डिसीज से जूझ रहे हर मरीज को इस रूम में नहीं रखा जाता, बल्कि ये देखा जाता है कि मरीज के लक्षण कितने गंभीर हैं और वो सोशली कितना एक्टिव है. अगर मरीज लगातार खांस या छींक रहा है और तेज बुखार है तो उसे आइसोलेशन में तुरंत रखा जाता है.

जब तक ये लक्षण सामने नहीं आते हैं, उसे पैरासीटामोल देकर घर पर ही सेल्फ क्वेरेंटाइन में रहने को कहा जाता है. इस दौरान मरीज घर पर रहता है लेकिन सबसे अलग-थलग रहता है. यहां तक कि उसका टॉयलेट, तौलिया, खाने के बर्तन, कंघी और दूसरी टॉयलेटरीज भी अलग कर दी जाती हैं.

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क्वेरेंटाइन और आइसोलेशन में अंतर :

क्वेरेंटाइन का मतलब है, किसी ऐसे व्यक्ति को अलग-थलग रखा जाना जो किसी कोरोना मरीज के संपर्क में आ चुका हो या फिर ऐसी किसी जगह गया हो, जहां कोरोना फैल चुका है. क्वेरेंटाइन पीरियड के दौरान मरीज घर पर अलग रहता है और अपने लक्षणों पर गौर करता है.

अगर सर्दी, खांसी, बुखार जैसे लक्षण दिखाई दें तो अस्पताल में जांच होती है और फिर उसे आइसोलेशन में यानी एकदम अलग कमरे में रख दिया जाता है, जहां पूरा इलाज तब तक चलता है जब तक कि रिपोर्ट निगेटिव न आ जाए.

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