गायत्री मंत्र के जप से स्मरण शक्ति में चमत्कारिक वृद्धि

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आर्य समाज के प्रसिद्ध संत आनंद सरस्वती जी महाराज गायत्री माँ के परम भक्त थे। बचपन में ये पढ़ने में कमजोर थे। इसलिए स्कूल और घर दोनों जगह इन्हें डांट और मार सहन करनी पड़ती थी। सब जगह से अपमान और उपेक्षा मिलने से दुःखी होकर ये आत्महत्या करने की बात सोचा करते थे।

Miraculous Boost in Memory Power by Chanting Gayatri Mantra
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एक बार इन्होंने अपने गाँव की बरसाती नदी में पुल से छलांग लगा दी, किंतु जल में बहते हुए ये किनारे आ लगे और ग्रामीणों ने इन्हें इनके घर पहुँचा दिया। परंतु घर में घुसते ही पिता ने खूब पिटाई की। एक बार इनके गाँव में नित्यानंद जी नामक एक संत पधारे और इनके घर के बगीचे में ठहरे। पिता ने इन्हें महाराजजी को दोपहर का भोजन ले जाने का काम दिया। ये प्रतिदिन उन्हें भोजन ले जाते। एक दिन पाठ याद न होने से इन्हें स्कूल और घर में बुरी मार पड़ी। रोते-रोते इनकी आँखें सूज गईं। दोपहर को ये महाराजजी का भोजन लेकर उनके पास गए और थाली उनके सामने रखकर दीवार के साथ लगकर उदास खड़े हो गए। महाराजजी भोजन भी करते जाते थे और बारंबार इन्हें ताकते भी जाते थे।

भोजन करने के बाद उन्होंने इन्हें नाम लेकर पुकारा और पूछा- कहो बेटा! क्या बात है? आज तुम बड़े ही उदास क्यों खड़े हो? ये बोले- महाराजजी! कुछ बात नहीं है। संत बोले- नहीं! कुछ बात तो अवश्य है! आज तुम्हारी आँखें भी रोने से सूजी हुई सी दिखाई दे रही हैं। यह सुनते ही बालक फूट-फूटकर रोने लगा।  संत ने बड़े प्रेम से बालक को अपने पास बैठाकर पूछा- बेटा! बताओ, तुम्हें क्या कष्ट है, जो तुम इस प्रकार रो रहे हो?  तब बालक बोला- महाराजजी! मेरी बुद्धि मोटी है, इसलिए हर जगह मैं अपमानित होता हूँ। अब मैं जीवित नहीं रहना चाहता, मुझे मरने का कोई सरल उपाय बताइए! संत यह सुनकर बोले- अरे! तू इतनी सी बात से डर गया? हमारे पास तेरे रोग की औषधि है। अब तू चिंता न कर।  बालक बोला- महाराजजी! मुझे कृपया वह औषधि बताइए! संत बोले- अच्छा! एक कागज लेकर आओ। बालक ने कागज लाकर दिया। संत ने उस पर गायत्री मंत्र लिखकर ब्रह्ममुहूर्त में कुशासन पर एक आसन पर बैठकर जप करने का आदेश दिया।  बालक उसे पाकर फूला न समाया। वह प्रातः साढ़े तीन बजे उठकर स्नान करके एक आसन पर बैठकर ध्यान लगाकर जप करता। किंतु बालक होने के कारण कुछ समय बाद नींद आ जाती, तब वह आँखों पर पानी के छींटे देकर पुनः जप करने लगता, लेकिन तब भी नींद आ जाती। तब उसने अपनी लंबी चोटी में एक रस्सी बांधी और उसका सिरा छत में लगे कुंडे में बाँध दिया। अब जैसे ही बालक ऊँघता और उसका सिर नीचे होता, तुरंत उसकी चोटी खिंच जाती और वह सावधान होकर जप करने लगता। चार-पाँच महीने बाद बालक को हिंदी, गणित, अंग्रेजी, इतिहास आदि विषय चमत्कारिक रूप से याद होने लगे। वार्षिक परीक्षा में उसके अच्छे अंक देख अध्यापक कहने लगे जरूर तूने नकल की होगी। बालक यह सुनकर मुस्कराने लगता। उसके बाद जीवन की प्रत्येक परीक्षा उसने उत्तम अंकों से उत्तीर्ण की और उसे धन-संपत्ति भी प्राप्त होने लगा। इसके बाद गायत्री माँ की कृपा से उसने सभी सांसारिक सुख-सुविधाओं को ठोकर मार आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति का मार्ग भी चुना और बड़े होकर आर्य समाज के संत आनंद सरस्वती जी महाराज के नाम से विख्यात हुआ।

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