निर्भया के दोषियों को फांसी, जानिए फांसी से पहले क्या क्या होता है

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शुक्रवार को निर्भया के दोषियों की फांसी को लेकर सबकी निगाहें तिहाड़ जेल में टिक गई हैं। तिहाड़ में पहली बार किसी भी मामले के चार दोषियों को एक साथ फांसी पर लटकाया जाएगा। तिहाड़ जेल नंबर तीन में बने फांसी घर में शुक्रवार तड़के तीन बजे से ही हलचल शुरू हो जाएगी। Nirbhaya Case Convicts Hanging

दोषियों को जगाने से लेकर उन्हें तैयार कर फांसी घर तक ले जाने का काम जेलकर्मी करेंगे। वहीं गुनाहगारों को फांसी पर लटकाने का काम जल्लाद करेगा।

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डेथ वॉरंट आने के बाद आम कैदी नहीं :

जैसे ही ब्लैक वॉरंट जारी हो जाता है उस कैदी को बाकी कैदियों से अलग कर दिया जाता है।अब वह जेल का कोई काम नहीं करता। इस दौरान उसे खेलने, थोड़ा घूमने या फिर पढ़ने की छूट होती है। लेकिन इस दौरान भी उसपर पूरी निगरानी रहती है। वह उस केस में फांसी की सजा पाए अन्य कैदियों से मिल भी सकता है।

सुबह तीन बजे से जेल में हलचल :

फांसी वाला दिन जेल के लिए आम नहीं होता। सुबह तीन बजे से ही जेल में हलचल शुरू हो जाती है। जिसे फांसी दी जानी है और जो फांसी देगा (जल्लाद) उसे करीब 3-4 के बीच उठा दिया जाता है। इस बीच कैदी को नहाने और नाश्ता करने को कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जल्लाद फांसी की तैयारी करेगा। इसमें फांसी में इस्तेमाल होनेवाली रस्सियों को बांधना, लीवर आदि फिर से चेक करना शामिल होता है।

यह काम वह एक रात पहले और उससे पहले ट्रायल में भी करता है। लेकिन उन रस्सियों को वह उतारकर ले जाता है और फांसी वाले दिन फिर बांधता है। फांसी से पहले हुई मीटिंग में यह भी तय हो जाता है कि फांसी के दौरान कोई मुंह से कुछ नहीं बोलेगा। सिर्फ इशारों में काम होगा।

Nirbhaya Case Convicts Hanging
Nirbhaya Case Convicts Hanging

जेल में जेल अधीक्षक, उप अधीक्षक, मेडिकल ऑफिसर, जिला उपायुक्त (राजस्व) व 12 सुरक्षाकर्मी व एक सफाईकर्मी मौजूद होते हैं। यहां पर उससे किसी के नाम कोई खत लिखने या फिर आखिरी इच्छा के बारे में दोबारा पूछा जाता है। दोषी के पास 15 मिनट का समय होता है।

आखिरी इच्छा में क्या पूछा जाता है :

तुम्हें फांसी होने वाली है, अपनी आखिरी इच्छा बताओ…..यह लाइन फिल्मों में आपने बहुत सुनी होगी। लेकिन असल फांसी के दौरान ऐसा नहीं होता। फांसी से पहले ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा जाता कि क्या खाओगे, क्या पियोगे। तिहाड़ में जेलर रहे सुनील गुप्ता बताते हैं कि फांसी से पहले बस एसडीएम आता है। वह पूछता है कि फांसी पा रहे शख्स के पास अगर कोई संपत्ति है तो वह उसका क्या करना चाहता है। हालांकि, भारत के इतिहास में जितनी भी फांसी हुई उसमें किसी बंदी ने कोई संपत्ति किसी रिश्तेदार या अन्य के नाम नहीं लिखवाई।

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फांसी के वक्त हाथ पैर बांधने के पीछे की वजह :

पवन जल्लाद बताते हैं कि फांसी देते वक्त कैदी के हाथ पीछे बांधे जाते हैं। फिर फांसी के तख्ते के ऊपर पहुंचते ही पैर भी बांध दिए जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है और यहां से 100 कदम दूर फांसी घर तक ले जाया जाता है।

फांसी घर पहुंचने के बाद सीढ़ियों के रास्ते दोषी को उसकी छत पर ले जाया जाता है। जहां जल्लाद पहले से मौजूद होता है। जो दोषी को फांसी के तख्ते के पास ले जाता है। दोषी के चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया जाता है ताकि कैदी घबराकर खुद को बचाने के लिए इधर-उधर न भागे और न ही किसी और को नुकसान पहुंचा पाए।

कुछ मामलों में मुजरिमों के भागने की घटनाएं हुईं, जिसके बाद यह प्रक्रिया की जाती है। मुंह पर काला कपड़ा इसलिए बांधा जाता है क्योंकि कुछ की जीभ और आंखें बाहर निकल आती हैं, अगर कपड़ा नहीं होगा तो वहां खड़े लोग विचलित हो सकते हैं। और फिर उसके गले में फांसी का फंदा डाल देता है। साथ ही दोषी के पैर को रस्सी से बांध देता है।

Nirbhaya Case Convicts Hanging
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फांसी घर में कौन-कौन मौजूद होता है :

फांसी के वक्त फांसी घर में ज्यादा लोगों को नहीं रखा जाता। वहां कैदी और जल्लाद के अलावा कुछ चुनिंदा लोग ही होते हैं। इसमें एक डॉक्टर होता है। वह ही फांसी के बाद यह पुख्ता करता है कि मौत हो गई है। फिर वही डेथ सर्टिफिकेट जारी करता है। इसके अलावा एक एसडीएम, जेल सुपरिंटेंडेंट, 10 से 12 पुलिसवाले शामिल होते हैं।

रूमाल से इशारा, लीवर खींचा और मौत :

कैदी को नहाने के बाद काले कपड़े पहने को दिए जाते हैं। फिर उसे पुलिसवाले पकड़कर फांसी के तख्ते तक लाते हैं। फिर उसे उस मार्क पर खड़ा किया जाता है जो जल्लाद ने बनाया होता है। फिर जल्लाद काला कपड़ा, फंदा पहनाकर अपनी तरफ से रेडी होने का इशारा देता है। दूसरी तरफ जेल अधिकारी घड़ी में वक्त देखकर रूमाल हिलाकर फांसी का इशारा देता है, जिसके तुरंता बाद जल्लाद लीवर खींच देता है।

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फिर शख्स तख्ते पर झूल जाता है, काफी झटपटाने के बाद आमतौर पर दो घंटे के अंदर उसकी मौत हो जाती है। इसके बाद डॉक्टर चेक करके मौत की पुष्टि कर देता है। फिर जल्लाद ही बॉडी से फंदा निकालता है। फिर बॉडी अंतिम संस्कार के लिए भेज दी जाती है।

जल्लाद से पहली मुलाकात ही होती है आखिरी :

जल्लाद जेल में एक या दो दिन पहले ही पहुंच जाते हैं। लेकिन उन्हें उस शख्स से नहीं मिलाया जाता, जिसे फांसी दी जानी होती है। फांसी वाले दिन सुबह होनेवाली मुलाकात ही पहली होती है। यही मुलाकात उनकी आखिरी मीटिंग बन जाती है।

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सुबह-सुबह ही क्यों दी जाती है फांसी? :

फांसी की प्रक्रिया पूरी होने से पहले जेल में उस दिन कोई दूसरा काम नहीं होता। सारे दरवाजे बंद रखे जाते हैं। फांसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही जेल खोली जाती है, बाकी कैदियों को बाहर छोड़ा जाता है। फांसी सुबह सूरज निकलने से पहले दी जाती है। इसके पीछे बड़ी वजह यही बताई जाती है कि इससे रिश्तेदारों को बॉडी लेकर जाने और उसका अंतिम संस्कार करने के लिए ज्यादा वक्त मिल पाता है।

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