जानिए एक था टाइगर के असली टाइगर ‘ब्लैक टाइगर’ की सच्ची कहानी

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जासूसी करना बाएं हाथ का खेल नहीं है। और फिर बात पाकिस्तान जैसे देश में जाकर जासूसी करने की हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह काम जान हथेली पर लेकर चलने से कम नहीं। हर वक्त पकड़े जाने का डर, यातना और मौत का डर और अपने देश, घर-परिवार से दूर रहने और शायद कभी न मिल पाने का दुःख और साथ ही पकड़े जाने पर देश के द्वारा त्यागे जाने की मजबूरी लेकर चलना अपने आप में एक जासूस की जांबाजी, समर्पण, देशभक्ति और दिलेरी की कहानी कह देते हैं।  तो आइये जानते हैं ऐसे ही एक जासूस ब्लैक टाइगर की कहानी।  Story Of Black Tiger Ravindra Kaushik

कौन थे रविन्द्र कौशिक

भारत माता के एक ऐसे ही जांबाज सपूत थे रविन्द्र कौशिक उर्फ़ ब्लैक टाइगर जिन्होंने अपनी जिन्दगी के 25 साल अपनी मातृभूमि की सेवा करते हुए पाकिस्तान में गुजार दिए। इनमें से सोलह यातनापूर्ण साल उन्होंने पाकिस्तान की अलग-2 जेलों में गुजार दिए लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी असली पहचान या भारतीय सेना के बारे में कोई भी जानकारी पाकिस्तान को हासिल नहीं होने दी।

ड्रामा आर्टिस्ट से बने सफल रॉ एजेंट

रविन्द्र कौशिक उर्फ़ ब्लैक टाइगर का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल 1952 को हुआ। वह एक प्रसिद्ध थिएटर आर्टिस्ट थे। लखनऊ में आयोजित एक नेशनल लेवल ड्रामा कार्यक्रम में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ(RAW) के एक अधिकारी ने उन्हें परफॉर्म करते हुए देखा। एक जासूस बनने के लिए जरूरी लगन, प्रतिभा और हिम्मत को उस अधिकारी ने पहचान लिया था। ‘रॉ’ ने उनसे संपर्क किया और उन्हें पाकिस्तान में भारत के एक अंडर-कवर एजेंट की नौकरी का सुझाव दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

रविन्द्र कौशिक को ‘रॉ’ के द्वारा दिल्ली में दो साल का गहन प्रशिक्षण दिया गया। उनका ‘खतना’ किया गया ताकि वे एक मुस्लिम ही लगें। उन्हें उर्दू और इस्लाम की मजहवी शिक्षा भी दी गयी। उन्हें पाकिस्तान के भूगोल और अन्य जरूरी जानकारी दी गयी। श्रीगंगानगर से होने के कारण पंजाबी पर उनकी अच्छी-खासी पकड़ थी जो कि पाकिस्तान के अधिकतर हिस्सों में बोली जाती है। महज 23 वर्ष की उम्र में सन 1975 में उन्हें ‘नबी अहमद शाकिर’ नाम देकर मिशन पर पाकिस्तान भेज दिया गया।

क़ानून की पढाई करने के बाद पाकिस्तानी आर्मी में बने मेजर

रविन्द्र कौशिक ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पढाई के लिए कराची के लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और क़ानून में ग्रेजुएशन किया। पढाई ख़त्म होने के बाद वह पाकिस्तानी सेना के एकाउंट्स विभाग में सिविलियन क्लर्क के रूप में भर्ती हो गए। बाद में वह प्रमोशन पाते हुए मेजर रैंक तक पहुँच गए। इसी बीच उन्होंने वहां पर एक आर्मी यूनिट के दर्जी की बेटी अमानत से शादी कर ली तथा एक बेटी के पिता बन गये।

रविन्द्र कौशिक ने 1979 से लेकर 1983 तक सेना और सरकार से जुडी अहम जानकारियां भारत पहुंचाई। इस दौरान पाकिस्तान के हर कदम पर भारत भारी पड़ता था क्योंकि उसकी सभी योजनाओं की जानकारी कौशिक की ओर से भारतीय अधिकारियों को दे दी जाती थी। उनके काम से प्रभावित होकर ‘रॉ’ और तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ का नाम दिया।

दूसरे की गलती ब्लैक टाइगर पर पड़ी भारी

1983 का साल ब्लैक टाइगर के लिए मनहूस साबित हुआ। 1983 में रविंद्र कौशिक से मिलने रॉ ने एक और निचले स्तर के ऑपरेटिव एजेंट इनायत मसीह को पाकिस्तान भेजा। लेकिन वह पाकिस्तान खुफिया एजेंसी के हत्थे चढ़ गया। लंबी यातना और पूछताछ के बाद उसने रविंद्र के बारे में सब कुछ बता दिया। रॉ की अधूरी तैयारी ब्लैक टाइगर के लिए घातक साबित हुई।

रविंद्र को गिरफ्तार कर सियालकोट की जेल में डाल दिया गया। दो साल तक पूछताछ में भारी लालच और यातना देने के बाद भी उन्होंने भारत की कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में पाकिस्तान की सुप्रीम-कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया। मियांवाली जेल में 16 साल कैद काटने के बाद 2001 में टीबी और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

मौत के बाद भी सरकार ने नहीं ली परिवार की सुध

उनकी मौत के बाद भारत सरकार ने ‘छद्म विकल्प’(Covert Option) की मजबूरी के चलते उनका शव लेने से मना कर दिया। उन्हें मियांवाली जेल के पीछे दफना दिया गया।

रविंद्र ने जेल से गुप्त तरीके से कई चिट्ठियां अपने परिवार को लिखीं। वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों की कहानी बताता था। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार, एक खत में उसने अपने पिता से पूछा था कि क्या भारत जैसे बड़े मुल्क में कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है? सूत्रों के अनुसार उनकी मौत के बाद भारत सरकार ने उनकी और उनकी परिवार की कोई सुध नहीं ली।

दुश्मन देश में पकड़े जाने पर किसी भी जासूस के साथ यही त्रासदी होती है जैसा कि रवींद्र कौशिक का हुआ। सीमावर्ती इलाकों के बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि दशकों तक पाकिस्तानी जेलों में रहकर रिहा कर दिए गए।

परिवार की मांग, ‘एक था टाइगर’ फिल्म का मिले क्रेडिट

रवींद्र के परिवार ने दावा किया की वर्ष 2012 में प्रदर्शित मशहूर बॉलीवुड फिल्म ‘एक था टाइगर’ का शीर्षक रवींद्र कौशिक के जीवन पर आधारित थी। ‘एक था टाइगर’ बॉलीवुड फिल्म में सलमान खान के कई रूपों- जासूस, प्रेमी, देशभक्त और एक बेहतरीन एक्शन फाइटर के रूप में एक साथ दिखाया गया है। ‘एक था टाइगर’ के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में केस दायर हुआ था। जयपुर के वैशालीनगर में रहने वाले विक्रम वशिष्ठ ने दावा किया था फिल्म की कहानी उनके मामा के वास्तविक जीवन पर आधारित है। उन्होंने मांग की थी कि उनके मामा को क्रेडिट दिया जाए।

 

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