जानिये क्या होता है फ्लोर टेस्ट और कैसे साबित किया जाता है बहुमत

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मध्य प्रदेश में राजनीतिक सत्ता में विधायकों के इस्तीफे के बाद अब मामला अब फ्लोर टेस्ट होने को लेकर आ गया है। फ्लोर टेस्ट से पहले सियासी हलचल बढ़ गई है। कांग्रेस (Congress) और बीजेपी (BJP) दोनों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। Floor Test and Its Process

कमलनाथ (Kamal nath) ने पहले पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह, राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा समेत कई वरिष्ठ नेताओं से मीटिंग की। इधर, बीजेपी के दिग्गजों ने भी अहम बैठक की है। बीजेपी ने सभी विधायकों को सदन में उपस्थित रहने को लेकर विप जारी किया है।

राज्यपाल लालजी टंडन ने शनिवार देर रात कमलनाथ को पत्र लिखकर 16 मार्च से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने का निर्देश दिया है। राजभवन के सूत्रों ने बताया कि शनिवार आधी रात के आसपास राज्यपाल ने यह पत्र मुख्यमंत्री कमलनाथ को भेजा।

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फ्लोर टेस्ट एक संवैधानिक प्रावधान है। इसके लिए सरकार द्वारा विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव रखा जाता है, जिसके लिए सदन में मतदान होता है। जब एक से अधिक लोग सरकार बनाने का दावा पेश करते हैं, और बहुमत साफ नहीं होता है, तो राज्यपाल विशेष सत्र बुलाकर साबित करने को कह सकते हैं, कि किसके पास बहुमत है।

यह बहुमत सदन में मौजूद विधायकों के वोट के आधार पर होता है। इसमें विधानसभा सदस्य मौखिक तौर पर भी वोट कर सकते हैं। वहीं विधायकों को मौजूद नहीं रहने और वोट नहीं डालने की भी आजादी होती है। बराबर वोट डालने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष भी मतदान कर सकते हैं।

Floor Test and Its Process
Floor Test and Its Process

क्या होता है फ्लोर टेस्ट :

विधानसभा में सबके सामने अपना बहुमत साबित करने की प्रक्रिया को फ्लोर टेस्ट कहते हैं। फ्लोर टेस्ट में अपनी पार्टी के लिए विधायक स्पीकर के सामने अपना वोट करते हैं। अगर किसी भी राज्य में एक से अधिक पार्टियां सरकार बनाने का दावा करती है लेकिन किसी भी पार्टी का बहुमत साबित न हो तो ऐसी स्थिति में उस राज्य का राज्यपाल किसी एक पार्टी को फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करने के लिए कहता है।

जैसे की महाराष्ट्र चुनाव के फ्लोर टेस्ट में भाजपा को अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा गया है। फ्लोर टेस्ट के दौरान विधानसभा में सभी विधायकों को बहुमत चुनाव के लिए बुलाया जाता है।

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सामान्य शब्दों में समझे तो जब राज्य में नई सरकार सीधे तौर पर न बन पा रही हो और पार्टी को बहुमत साबित करना हो, तो इसे फ्लोर टेस्ट कहा जाता है। फ्लोर टेस्ट तीन तरह से साबित होता है। पहला ध्वनिमत, दूसरा संख्याबल और तीसरा हस्ताक्षर के जरिए मतदान दिखाया जाता है।

तीन तरह से साबित होता है बहुमत :

बहुमत भी तीन तरह से साबित किया जाता रहै। पहला ध्वनिमत (आवाज), दूसरा संख्याबल और तीसरा लॉबी बंटवारा (बैलेट बॉक्स)। संख्याबल में विधायक सदन में खड़े होकर अपना बहुमत दर्शाते हैं। वहीं लॉबी बंटवारा में विधानसभा सदस्य विधानसभा में आते हैं और रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं। हां के लिए अलग लॉबी और न के लिए अलग लॉबी होती है।

Floor Test and Its Process
Floor Test and Its Process

कैसे किया जाता है फ्लोर टेस्ट :

ईवीएम, बैलेट बॉक्स या आवाज किसी भी तरह फ्लोर टेस्ट किया जा सकता है। अगर फ्लोर टेस्ट में पक्ष तथा विपक्ष दोनों पार्टियों को बराबर बहुमत मिलता है तो विधानसभा स्पीकर अपने पसंद से वोट करवा कर किसी एक पार्टी की सरकार बनवा सकती है। वोटिंग होते समय पहले मौजूद सभी विधायकों से मत देने के लिए कहा जाता है और इसके बाद विधायकों को पक्ष तथा विपक्ष में बंटने के लिए कहा जाता है।

इसके बाद दोनों पार्टियों के विधायकों की गिनती की जाती है, विधायकों की गिनती होने के बाद स्पीकर फ्लोर टेस्ट परिणाम की घोषणा करता है।

कितनी तरह के होते हैं फ्लोर टेस्ट :

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सामान्य फ्लोर टेस्ट –

सामान्य फ्लोर टेस्ट तब होता है, जब कोई पार्टी या फिर गठबंधन का नेता मुख्यमंत्री बनता है। इसके लिए उसे सदन में बहुमत साबित करना होता है। अगर सरकार पर कोई संकट आता है, या फिर राज्यपाल को लगे कि सरकार सदन का विश्वास खो चुकी है, उस स्थिति में भी सामान्य फ्लोर टेस्ट होता है। इसमें सदन में मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव लाता है और इसके बाद वोटिंग होती है।

उदाहरण के तौर पर कर्नाटक के फ्लोर टेस्ट को समझिए, जुलाई 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर संकट आया। जिसके बाद फ्लोर टेस्ट हुआ। वोटिंग के दौरान कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में 99 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में 105 वोट पड़े। इस तरह कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार गिर गई और येदियुरप्पा ने बाजी मार दी।

Floor Test and Its Process
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कंपोजिट फ्लोर

जब एक से ज्यादा नेता सरकार बनाने का दावा करते हैं, इस स्थिति में कंपोजिट फ्लोर होता है। इसके लिए राज्यपाल विशेष सत्र बुलात हैं और फिर ये देखा जाता है कि किस नेता के पास बहुमत है। इसके बाद सदन में विधायक खड़े होकर या फिर हाथ उठाकर, ध्वनिमत से या डिविजन के माध्यम से वोट देते हैं।

यहां उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार का उदाहरण लिया जा सकता है, जब फरवरी 1998 में यूपी में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। तब कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने 48 घंटे के अंदर कंपोजिट फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया। 225 वोट हासिल कर कल्याण सिंह जीत गए। जगदंबिका पाल को महज 195 वोट मिले थे। सियासी इतिहास के पन्नों में ये किस्सा भी काफी चर्चित है। तब जगदंबिका पाल एक दिन के मु्ख्यमंत्री बने थे और इस किस्से को आज भी याद किया जाता है।

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26 साल पहले तक नहीं होता था फ्लोर टेस्ट :

तो आपको बता दें कि 26 साल पहले तक सरकार बर्खास्त करने से पहले फ्लोर टेस्ट नाम की कोई भी चीज नहीं होती थी। इसकी शुरुआत हुई थी साल 1989 में, जब  कर्नाटक की बोम्मई सरकार गिरने के पांच साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट को अनिवार्य कर दिया था।

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