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आखिर कौन है ये महिला जिसे पीएम मोदी 24 घंटे अपने साथ लेकर घूमते है, जानकर रह जायेंगे हैरान

मोदी जी कौन नहीं जानता आज देश ही नहीं विदेश में भी उनके चाहने वाले करोडो की संख्या में है हर कोई उनकी हाजिर जवाबी बात करने की शैली लोगो से मिलने की कला आदि से प्रभावित है ,लोग उनके विरोधी हो सकते है पर उनकी वाक्पटुता की सभी तारीफ करते है आप में से कई लोग भी इनके प्रशंसक होंगे पर सोचिये आखिर वो कैसे सबसे इतनी आसानी से मिल लेते है कैसे सबकी बाते उनके पास पहुचती है Who Is This Women With PM Modi

तो आज हम आपको बतायेगे की आखिर कैसे वो अपनी बात सब लोगो तक पहुचाते है,कैसे दुनिया भर की भाषाओं में उनके भाषण पहुचते है

प्रधान मन्त्री का भाषण देश ही नहीं पूरी दुनिया में सुना जाता है. लेकिन अब बात ये उठती है की प्रधानमंत्री को केवल गुजराती हिंदी और अंग्रेजी ही आती है तो वो और देश के लोगों तक अपना भाषण कैसे पहुचाते हैं. मोदी जब भी विदेशी दौरे पर होते है वो ज्यादातर लोगों से हिंदी में बात करते हैं ऐसे में सवाल उठता है की जब भी पीएम मोदी हिंदी में भाषण देते हैं तो वर्ल्ड लीडर उनकी बातों को कैसे समझ पाते हैं.

आज हम आपको गुरदीप चावला से मिलवाने जा रहे है जो ज्यादातर विदेशी दौरे में पीएम मोदी के साथ होती है. और मोदी  के भाषणों का अनुवाद करती हैं. जब भी पीएम मोदी कहीं हिंदी में भाषण देते हैं तो गुरदीप परदे के पीछे बैठ उस भाषण का अंग्रेजी में लाइव अनुवाद करती हैं जिससे विदेशी मेहमानों और राजनेताओं को पीएम मोदी का भाषण समझ में आता है.

पीएम मोदी जब प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार अमेरिका गए तो उन्होंने वह पर मेडिसिन स्क्वायर पर 18000 भारतीयों के बीच भाषण दिया था. उस अमरीकी दौरे पर गुरुदीप ख़ास तौर पर पीएम मोदी के विशेष विमान में उनके साथ गयी थी और वहां पर उनके भाषण का अनुवाद किया था. साल 2010 में बराक ओबामा की टीम ने उन्हें राष्ट्रपति ओबामा के पहले भारत दौरे के लिए बुलाया था  उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उनकी द्वीपक्षीय मुलाकात होनी थी.

यु एन में जब तीन साल पहले मोदी ने हिंदी  भाषण दिया था तब उनके भाषण का अनुवाद अंग्रेजी में गुरुदीप चावला ने ही किया था.

गुरदीप चावला 27 साल से भाषा अनुवादक हैं. उन्होंने 1990 में उनका चयन संसद में भाषा अनुवादक के तौर पर हुआ था वहां उन्होंने 1996 तक काम किया. इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि उनके पति की अमेरिका में नौकरी लग गई और उन्हें अमेरिका जाना पड़ा. गुरदीप याद करते हुए कहती हैं कि अनुवादक के तौर पर उनकी जो ट्रेनिंग संसद में हुई, वो किसी भी प्रोफेशनल स्कूल में सिखाई नहीं जा सकती.

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