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कुरुक्षेत्र में ही क्यों लड़ा गया था महाभारत का युद्ध

महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के बीच लडा गया था। इस युद्ध में उन्नीस अक्षौणी सेना ने भाग लिया। यह युद्ध कुरूक्षेत्र में लडा गया था। कुरूक्षेत्र आज हरियाणा में स्थित है। लेकिन क्या आपको पता है कि यह युद्ध कुरूक्षेत्र में क्यों लडा गया था। इसके पीछे देवराज इंद्र दिया एक वरदान था जिसकी वजह से यह युद्ध कुरूक्षेत्र में लडा गया। यह माना जाता था कि इस युद्ध में मरने वाले प्रत्येक सैनिक को स्वर्ग की प्राप्ति हुयी थी। Why War Of Mahabharata Was Fought In Kurukshetra

इनके पुत्र थे कुरू :

कौरव वंश का नाम महाराज कुरू पर पडा था। राजा कुरू कौरव वशं के प्रथम पुरूष थे। कौरव वंश में एक से एक महाप्रतापी राजा हुये। इसी कुल में आगे चलकर कौरव और पांडव हुये जिनके बीचे महाभारत का युद्ध हुआ। एक समय हस्तिनापुर में एक महाप्रतापी राजा हुये। जिनका नाम था संवरण। संवरण का विवाह सूर्यदेव की पूत्री ताप्ती से हुआ। ताप्ती और संवरण के एक तेजस्वी पूत्र हुआ जिसका नाम उन्होनें कुरू रखा। प्राचीन भारत में सोलह महाजनपद थे जिनमें से एक का नाम कुरू के नाम पर रखा।

धर्मग्रंथों में कहा गया है :

कुरूक्षेत्र वही जगह है जहां श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। कुरूक्षेत्र की महिमा के बारे में महाभारत के साथ ही कई धर्मग्रंथो में दिया गया है। महाभारत के वनपर्व में बताया गया है कि जो भी लोग कुरूक्षेत्र में जाकर लोग पापों से मुक्त हो जाते है और जिस व्यक्ति के प्राण कुरूक्षेत्र में निकलते है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वहां की धुलकण भी इतनी पवित्र है कि उसे भी कोई पा ले तो उसे परमपद मिल जाता है। नारद पुराण में भी यहां की महत्ता के बारे में बताया गया है कि नक्षत्र, ग्रह और तारे भी जिस कालगति की वजह से नीचे गिरने का भय रहता है। लेकिन जो व्यक्ति कुरूक्षेत्र में मरता है उसे जीवन मृत्यू से छुटकारा मिल जाता है और वापिस पृथ्वी पर पुर्नजन्म नहीं लेना पडता है।

इन देवता ने दिया था वरदान :

कुरूक्षेत्र की भूमि के पवित्र होने के पीछे देवराज इंद्र का दिया एक वरदान है। महाभारत के अनुसार जिस भूमि को कुरू ने बार बार जोता उस भूमि का नाम कुरूक्षेत्र पडा। लगातार लम्बे समय तक इस भूमि को जोतने पर जब इद्रं ने राजा कुरू से इसका कारण पुछा तो राजा कुरू ने बताया की मेरी प्रबल इच्छा है कि इस भूमि पर जिसकी भी मृत्यू हो उसे स्वर्ग मिले। लेकिन देवराज इंद्र ने राजा कुरू की बात को हंसी में उडा दिया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वे ऐसा करते रहे। इंद्र ने यह बात अन्य देवताओं को कही। राजा कुरू प्रतापी थे और देवता भी उन्हें पक्ष में करना चाहते थे। तब इंद्र ने राजा कुरू के पास जाकर कहा कि आप यह कष्ट ना करें। इस भूमि पर कोई भी व्यक्ति निराहार रहकर युद्ध में मारा जायेगा उसे स्वर्ग मिलेगा। इस बात का पता भीष्म और श्रीकृष्ण सभी को पता था इसलिये उन सभी योद्धाओं के कहने पर ही महाभारत युद्ध के लिये कुरूक्षेत्र को चुना गया।

ऐसे बढ़ा राजा कुरू का वंश :

राजा कुरू के विवाह शुभांगी से हुआ। उनके पुत्र विदुरथ हुये। विदुरथ का विवाह हुआ संप्रिया से। इनके एक पुत्र हुआ उसका नाम रखा अनाश्वा। अनाश्वा और अमृता से हुआ परिक्षित, परिक्षित और सुयशा से भीमसेन पैदा हुये। भीमसेन और कुमारी से हुये प्रतिश्रवा, प्रतिश्रवा के सुनंदा से तीन पूत्र हुये देवापि, बाह्लिक और शांतनू। शांतनू के पूत्र हुये देवव्रत जिन्हें भीष्म के नाम से भी जाना जाता है लेकिन उन्होने विवाह नहीं किया इसलिये उनका वंश आगे नहीं चला। शांतनू ने दूसरी शादी की सत्यवती से। इस शादी से दो पुत्र हुये विचित्रवीर्य और चित्रांगद। चित्रांगद जल्दी मृत्यु को प्राप्त हुये और विचित्रवीर्य ने अंबिका और अंबालिका से विवाह किया। विचित्रवीर्य के दो पुत्र हुये धृतराष्ट्र और पांडू। धृतराष्ट के गांधारी से सौ पुत्र हुये जो कौरव कहलाये। और पाण्डु ने कुन्ती और माद्री से विवाह किया। उनके पुत्र पाण्डव कहलाये।

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